شهید اصغر نجفی: تفاوت بین نسخهها
Kheyri9803 (بحث | مشارکتها) |
Jafari9809 (بحث | مشارکتها) |
||
| سطر ۱: | سطر ۱: | ||
| − | + | {{جعبه اطلاعات افراد نظامی | |
| − | نام | + | |نام فرد = اصغر نجفی |
| − | + | |تصویر = min-picture - 2019-09-29T151336.021.jpg | |
| − | + | |توضیح تصویر = | |
| − | + | |ملیت = [[پرونده:پرچم ایران.png|22px]] ایرانی | |
| − | + | |شهرت = | |
| − | + | |دین و مذهب = [[مسلمان]]، [[شیعه]] | |
| − | + | |تولد = [[زادروزهای 07خرداد|1338]] ، [[قزوین]] | |
| − | + | |شهادت = [[الگو:شهدای 04اسفند|1364/12/04]] | |
| − | + | |وفات = | |
| − | + | |مرگ = | |
| − | + | |محل دفن = | |
| − | + | |مفقود = | |
| − | + | |جانباز = | |
| − | + | |اسارت = | |
| − | + | |نیرو = | |
| − | + | |یگانهای خدمت = | |
| − | تحصیلات | + | |طول خدمت = |
| − | + | |درجه = | |
| − | + | |سمتها = معاون فرمانده گردان | |
| − | + | |جنگها = | |
| − | + | |نشانهای لیاقت = | |
| − | + | |عملیات = | |
| − | + | |فعالیتها = | |
| + | |تحصیلات = سوم راهنمائی | ||
| + | |تخصصها = | ||
| + | |شغل = | ||
| + | |خانواده = | ||
| + | }} | ||
==زندگینامه== | ==زندگینامه== | ||
| سطر ۴۷: | سطر ۵۲: | ||
==پانویس== | ==پانویس== | ||
<references /> | <references /> | ||
| − | |||
| − | |||
| سطر ۵۹: | سطر ۶۲: | ||
[[رده: شهدای ایران]] | [[رده: شهدای ایران]] | ||
[[رده: شهدای استان قزوین]] | [[رده: شهدای استان قزوین]] | ||
| − | |||
نسخهٔ ۲۰ بهمن ۱۳۹۸، ساعت ۱۰:۰۵
| اصغر نجفی | |
|---|---|
![]() | |
| ملیت | |
| دین و مذهب | مسلمان، شیعه |
| تولد | 1338 ، قزوین |
| شهادت | 1364/12/04 |
| سمتها | معاون فرمانده گردان |
| تحصیلات | سوم راهنمائی |
زندگینامه
شهید اصغر نجفی هفتم خرداد ۱۳۳۸ در روستای شیراز تابعه شهرستان قزوین به دنیا آمد.پدرش اکبر، کشاورز بود و مادرش خدیجه نام داشت.تا پایان دوره راهنمایی درس خواند.سال ۱۳۵۸ ازدواج کرد و صاحب یک پسر و شش دختر شد.به عنوان پاسدار در جبهه حضور یافت.چهارم اسفند ۱۳۶۴ با سمت معاون فرمانده گردان در فاو عراق به شهادت رسید.مزار او در گلزار شهدای شهرستان زادگاهش واقع است.
خاطرات
زهرا نجفی، فرزند شهید:" من فقط پنج سالم بود، که بابا اصغرم شهید شد .پس چیز زیادی از او به یاد ندارم؛ فقط یادم است چند ماهی بابا را ندیده بودیم.یک شب دیر وقت، مادرم ما را بیدار کرد و گفت:« بیایید بابایتان آمده است »و ما که اصلاً باور نمیکردیم،در حالی که او خواب بود همه روی سرش ریختیم و کلی خوشحالی کردیم.یک بار دیگر هم یادم است که چندین سال پیش، روز تولد « حضرت علی » (ع) که «روز پدر » هم هست ـ دلم میخواست پدرم بود و هدیهای به او میدادم . به یاد بابا« قرآن »را باز کردم و آیهی « ولا تحسبن الذین قتلوا ... » آمد.خیلی برایم جالب بود و یکجورهایی اطمینان قلب پیدا کردم ."[۱]
نگارخانه تصاویر
پانویس
